वैलेंटाइन डे" मोहब्बत की निशानी या अय्याशी का दिन ?..अकील अहमद मिसबाही

 "वैलेंटाइन डे" मोहब्बत की निशानी या अय्याशी का दिन?!:अकील अहमद मिसबाही



यह बात सब जानते हैं कि हर साल 14 फरवरी नौजवानों के लिए बहुत अहम होती है खासतौर से प्रेमी जोड़ों के लिए, क्योंकि इस दिन को वह लोग "वैलेंटाइन डे "की शक्ल में मनाते हैं इस मौके पर नौजवान प्रेमी जोड़े अपने साथी से अपनी मोहब्बत का इजहार करते है और किसी होटल या पार्क या पार्टी में एक दूसरे से मिलने की तैयारी करते है और यौमे मोहब्बत के तौर पर इसको मनाते हैं जो हिंदुस्तानी कल्चर, भारतीय संस्कृति व सभ्यता के भी खिलाफ है और इस्लाम तो ऐसी बेहयाई की कभी इजाजत नहीं देता है ।यही वजह है कि अक्सर  रहनुमाओं और धार्मिक गुरुओं ने इसका विरोध किया है ।और करना भी चाहिए

 असल में "वैलेंटाइन डे" किसी दिन और किसी कौम यह किसी धर्म या त्यौहार का नाम नहीं है बल्कि यह यूरोप और अमेरिका की पैदावार है और रूम के एक संत का नाम है और 1969 में कैथोलिक चर्च ने 11 सेंट के नाम इस ताल्लुक से पेश किया था।

 इसका आरंभ: इस बुरी प्रथा की शुरुआत अमेरिका से हुई और यह ईसाइयों तक ही महदूद होकर रह गया था। लेकिन धीरे-धीरे भारतीयों में भी यह यह मुसीबत आम हो गई।

    हुआ यूं कि रूम के राजा सम्राट क्लॉडियस का मानना यह था कि जो लोग शादी कर लेते हैं उनका दिमाग़ कमजोर हो जाता है और वह लोग मुल्क को छोड़ कर अपनी बीवी और बच्चों में लग जाते हैं जिसके नतीजा में उसने यह हुक्म जारी कर दिया कि उसका कोई भी सिपाही या सरकारी कर्मचारी विवाह नहीं कर सकता, बल्कि बाद में हर जवान नागरिक पर यह पाबंदी लगा दी गई लेकिन सैंट वेलेंटाइन ने उसकी मुखालफत की और चुपके चुपके नौजवानों का विवाह कराना शुरू कर दिया जब रूम के सम्राट ने देखा कि उसके हुक्म की मुखालफत हो रही है तो उसने वैलेंटाइन को फांसी दे दी चूँकि वह तारीख 14 फरवरी थी इसलिए नौजवान जोड़ें उस दिन को उसकी यादगार के तौर पर मनाने लगे।

वैलेंटाइन डे के बुरे नतीजे:

 हमारे कल्चर में इसका बहुत बुरा असर हो रहा है बिना किसी विवाह के किसी भी लड़के के साथ होटलों में रहना और उससे मियां बीवी के रिश्ते जैसा व्यवहार करना ऐसी बुराई है जिससे एक अच्छा समाज नफरत ही करेगा और  जिसकी इजाजत इस्लाम में हरगिज नहीं दी जा सकती और ना ही कोई अच्छी सभ्यता और संस्कृत इस चीज को क़बूल कर सकते हैं इसमें बहुत सी बुराइयां हैं इसमें औरतों की इज्जत तार-तार होती है और उनके घर वालों को बहुत सी दुश्वारियां का सामना करना पड़ता है जो लोग इसके हिमायती हैं वह भी नहीं चाहेंगे कि उनकी बहन के साथ को कोई ऐसा व्यवहार  करें और उनकी बेटी किसी के साथ ना जाएज रिश्ता काम करें ।इससे बलात्कार को भी बढ़ावा मिलता है। जबकि बलात्कार इस्लामी शरीयत के लिहाज से भी हराम है और हिंदुस्तानी कानून के लिहाज से भी ऐसा शख्स मुजरिम है और एक अच्छा समाज भी ऐसे हवस के पुजारियों को इंसान तसव्वर नहीं कर सकता है।

 वैलेंटाइन डे या सम्राट क्लॉडियस दिवस:

 उपरोक्त पंक्तियों से समझ में आ जाता है कि यह वैलेंटाइन डे मनाना नहीं हुआ क्योंकि वैलेंटाइन तो शादी कराना शुरू कर दिया था जिसके बदले में उसे फांसी दी गई। तो अस्ल में ये उसका दिन मनाना हुआ ही नहीं बल्कि रोम के सम्राट का दिन मनाना हुआ, जिसने मियां बीवी के रिश्ते को दिमागी कमजोरी करार दिया था और दूसरे यह वह करें जिनके पास ना कानून है ना कोई तौर तरीका हो ना अच्छा समाज हो।

 एक अच्छा और सुथरा पाक़ीज़ा दिमाग कभी ऐसे दिन को सेलिब्रेट नहीं करेगा क्योंकि यह दिन सिर्फ और सिर्फ अय्याशी और बे हयाई को आम करने के लिए रह गया है इसलिए इस दिन को सेलिब्रेट करना किसी भी लिहाज से दुरुस्त नहीं है और जो भी इस दिन को मनाने की सोचता या कहीं न कहीं से उसका हिमायती है वह एक बार जरूर सोच ले कि उसकी मां बहने भी हैं और बहुत बड़े स्कॉलर हजरत इमाम शाफई ने कहा था "कि बलात्कार एक कर्ज है जो किसी की बहन बेटियों के साथ करेगा वह कर्ज उसकी बहन बेटियों से भी वसूला जाएगा "

अंततः मैं अपने तमाम हिंदुस्तानी भाइयों से और खासतौर से नौजवानों से गुजारिश करता हूं कि उसका बाय काट करें ताकि आप खुद अपनी और अपने पड़ोसियों के घर को बचा सके और हमारी बहन बेटियां भी ऐसी पार्टियों का बाईकाट करके अपनी इज्जत और अपने घरवालों की इज्जत को बचाने की भरपूर कोशिश करें और मुल्क की बेटियों को भी चाहिए कि जिस मां-बाप ने  अपने खून पसीने की गाढ़ी कमाई से समाज में जीने के काबिल किया है क्या उनके एहसान का यही बदला है कि उनकी इज्जत मटिया मेल कर दो ?उनका जीना दूभर कर दो ?क्या जिन्होंने अपना सब कुछ कुर्बान करके तुम्हें जीने के काबिल बनाया उनका इतना भी हक नहीं है कि वह सर उठाकर जी सके।

आओ हम सब यह हद करें कि हमारी निगाहें अपनी काम की बेटियों को अपनी हवस का शिकार नहीं बनाएंगे और हम अपने घर की बेटियों को पर्दे में रखकर उन्हें इज्जत दे ने की कसम खाए और हवस के पुजारियों के मकसद को नाकाम बनाने में सर से सर छोड़कर कुछ करने का मन बनाए।

अकील अहमद कादरी ।

 अल जामिया तुल इस्लामिया रौनाही फैजाबाद।।

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