राम लहर वाली हैट्रिक के तर्ज पर सुल्तानपुर में भी यही है बीजेपी की स्थित।

राम लहर वाली हैट्रिक के तर्ज पर सुल्तानपुर में भी यही है बीजेपी की स्थित।

तीसरी जीत का ताज गांधी परिवार या दूसरा कोई इस पर संशय बरकार

भारतीय जनता पार्टी के लिए सुल्तानपुर लोकसभा सीट पर दूसरा मौका है, जब वो जीत की हैट्रिक लगाने के मुहाने पर खड़ी है। वरुण गांधी और मेनका गांधी यहां दो चुनाव जसे लगातार जीत रहे हैं। अब सवाल अहम है कि भाजपा गांधी परिवार के इन्हीं चेहरों पर भरोसा जताएगी या तीसरे चेहरा को प्रयोग में लाकर जीत की हैट्रिक लगाएगी। इससे पहले राम मंदिर लहर में भाजपा यहां से चेहरा बदलकर ही सही जीत की हैट्रिक लगा चुकी है। 

1991 में पहली बार भाजपा का खुला था खाता 

आपको बता दें कि अयोध्या से सटे सुल्तानपुर जिले की लोकसभा सीट पर रामलहर में भाजपा ने पहली बार 
1991 में जीत हासिल की थी। राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े अयोध्या के संत विश्वनाथ दास शास्त्री को पार्टी ने प्रत्याशी बनाया था। उन्होंने जनता से लड़ रहे पूर्व सांसद स्व. राम सिंह को हराया था। शास्त्री को 137485 मत मिले थे। 1996 का चुनाव आया तब पार्टी ने उन्हें रिपीट न करते हुए बाबरी विध्वंस के समय फैजाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे स्व. देवेंद्र बहादुर राय (डीबी राय ) पर दांव खेला। सुल्तानपुर के वोटरों ने उन्हें 238843 वोट देकर जिताया। उन्होंने सपा के स्व. कमरूरुज्जमा फौजी को पराजित किया था। 

1999 में भाजपा के सत्यदेव सिंह का नॉमिनेशन हुआ था कैंसिल 

1998 में पार्टी ने एक बार फिर उन पर दांव चला। 269951 मत पाकर उन्होंने सपा की रीता बहुगुणा जोशी वर्तमान में भाजपा सांसद को मात देकर भाजपा की जीत की हैट्रिक लगाया। वही अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार एक वोट से गिरने के बाद 1999 में फिर लोकसभा चुनाव हुआ। अब भाजपा का डीबी राय से मोह भंग हो चुका था। उसने गोंडा के रहने वाले वरिष्ठ नेता सत्यदेव सिंह पर दांव चला। नॉमिनेशन के आखिरी दिन उन्होंने पर्चा दाखिल किया था। तत्कालीन डीएम अनुराग श्रीवास्तव ने लेट पर उनका पर्चा खारिज कर दिया था। प्रदेश में तब कल्याण सिंह सीएम थे, लेकिन उन्होंने कानून हाथ में नहीं लिया था। 

1977 के बाद 2004 में जीता मुस्लिम कंडीडेट 

उधर हैट्रिक बना चुकी पार्टी का प्रत्याशी कबिना लड़े ही मैदान से बाहर गया था। इसका फायदा बसपा को मिला था। बसपा की सपा से सीधी फाइट हुई। बसपा प्रत्याशी जयभद्र सिंह (हाल ही में निधन हुआ है) ने 1,73,558 वोट प्राप्त कर सपा के राम लखन वर्मा को पराजित किया था। उनकी जीत से ही सुलतानपुर लोकसभा सीट पर यह पहली बार बसपा का खाता खुला था। पूरे पांच साल बाद इस जीत को 2004 में दोहराने में बसपा कामयाब रही। मोहम्मद ताहिर खान ने 261564 वोट लेकर सपा के शैलेंद्र प्रताप सिंह (वर्तमान में भाजपा एमएलएसी) को धूल चटाया था। 1977 के बाद ताहिर दूसरे ऐसे मुस्लिम नेता थे जिन्हें जीत मिली थी। वही 1991 से 1998 तक हैट्रिक लगाने वाली बीजेपी की स्थिति 2004 आते-आते ये हो गई कि 2004 और 2009 के चुनाव में वो चौथे पायदान पर लुढ़क गई। 

भद्र बंधुओं के चलते कम मार्जिन की मेनका को रही टीस 

लेकिन 2014 में जब वरुण गांधी भाजपा के सिंबल पर यहां पहुंचे तो उन्होंने सबको गर्दा कर दिया। राम लहर से अधिक तेज वरुण की आंधी चली। इसमें भद्र बंधुओं का भी बड़ा कमाल था। वरुण को 410348 मत मिले और उन्होंने बसपा से आए बाहुबली पूर्व विधायक पवन पाण्डेय को पराजित कर दिया। बीते 2019 के चुनाव में वरुण पीलीभीत चले गए और मेनका गांधी यहां आ गई। लेकिन इस बार मेनका के साथ मोदी मैजिक जहां चला वही वरुण भी फायर ब्रॉण्ड नेता बनकर यहां मां के लिए वोट मांगने पहुंचे। नतीजे में मेनका ने वरुण से अधिक 459196 मत तो पाए लेकिन वरुण की जीत के कर्णधार भद्र बंधु उनकी मां की जीत के अंतराल को कम कर गए। दरअस्ल सपा-बसपा गठबंधन की ओर से बसपा ने पूर्व विधायक चंद्रभद्र सिंह सोनू को टिकट दिया था। उन्हें 444670 मत हासिल हुए और इसकी टीस पूरे पांच साल मेनका को रही। 


मेनका का टिकट रिप्लेस पर 80 में 80 का नारा होगा फेल 


वही भाजपा ने आचार संहिता लागू होने के बाद भी भाजपा ने सुल्तानपुर से कंडीडेट डिक्लेयर नहीं किया है। जबकि इंडिया गठबंधन की ओर से सपा ने भीम निषाद को चेहरा बनाकर मैदान में उतारा है। वही बसपा से उदयराज वर्मा के नाम की चर्चा तेज है। जबकि मेनका गांधी के टिकट पर संशय बरकार है। वैसे राजनीतिक गणितज्ञों का कहना है कि मेनका का टिकट रिप्लेस हुआ तो 80 में 80 का नारा चरित्रार्थ नहीं हो पाएगा।

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